कटाक्ष दृक निपातेन - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (27)

कटाक्ष दृक निपातेन - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (27)

कटाक्ष दृक निपातेन निर्भिन्नहृदयात्मनाम्।
नानुसंधिलवोप्यस्ति विग्रहादेतु का स्पृहा॥

- श्री वंशी अलि, श्री राधासिद्धान्त (27)

श्री राधा की केवल एक तिरछी कटाक्ष में ऐसा अद्भुत जादू है कि उसको देखने वाले श्रीकृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के हृदय और आत्मा पूरी तरह से बिंध जाते हैं। कामनाओं की तो बात ही क्या है, वह चितवन अन्य किसी रूप का ध्यान या चिंतन करने का कोई अवकाश ही नहीं छोड़ती।