हों न भई रज कुंज ललित वन।
पद पंकज प्रिय कुँजबिहारी, लसि रहिती अति हीं सुमुदित मन॥ [1]
सज जोरी नव लाल किशोरी, जब मुख मेलि निहारती दर्पन।
ललित माधुरी दीठि निवारन, लै मुहि वारि डारती सखिजन॥ [2]
- श्री ललित माधुरी
यदि मैं वृंदावन की किसी ललित कुंज की रज होता तो यह मेरा परम सौभाग्य होता, जिससे मैं श्री श्यामाश्याम के चरण कमलों से लगा रहता और मेरा मन प्रसन्नता से सदा फूला रहता। [1]
जब श्रृंगारयुक्त नवल जोड़ी श्री श्यामाश्याम मुख से मुख मिलाये हुए दर्पण को निहारते, तो उनके मुख सौंदर्य की दीठि (नज़र) के निवारण हेतु, समस्त सखियाँ उस रज (मुझे) को लेकर श्यामा श्याम पर वार डालते । [2]

