सहज प्रीति गोपालै भावे - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605)

सहज प्रीति गोपालै भावे - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605)

(राग बसंत)
सहज प्रीति गोपालै भावे।
मुख देखें सुख होय सखीरी, प्रीतम नैन सों नैन मिलावे॥[1]
सहज प्रीति कमल और भानें, सहज प्रीति कुमोदनी और चंदे।
सहज प्रीति कोकिला बसंते, सहज प्रीति राधा नंदनंदे ॥ [2]
सहज प्रीति चात्रक और स्वांते, सहज प्रीति धरनी जल धारे।
मन क्रम बचन ‘दास परमानंद', सहज प्रीति कृष्ण अवतारे॥ [3]

- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (605)

श्री गोपाल जी को केवल सहज प्रेम ही प्रिय है, जिसमें कोई बनावट नहीं होती।
हे सखी, जब मैं अपने प्रियतम श्री कृष्ण का मुख देखती हूँ, तो उससे मुझे अपार सुख की प्राप्ति होती है, और जब वे नैन से नैन मिलाते हैं, तब तो आनंद की सीमा ही नहीं रहती। [1]

जैसे सूर्य को देखकर कमल स्वतः ही खिल उठता है, और चन्द्रमा को देखकर कुमुदिनी खिल उठती है।
जैसे कोयल का वसंत ऋतु से स्वाभाविक प्रेम होता है, वैसे ही श्री राधा और श्री कृष्ण का भी सहज प्रेम है। [2]

जैसे चातक पक्षी का स्वाति नक्षत्र के जल से सहज प्रेम होता है, और जैसे धरती और जल का आपस में स्वाभाविक प्रेम होता है, वैसे ही श्री कृष्ण के प्रति मन, कर्म और वचन से सहज प्रेम होना चाहिए। श्री परमानंद दास कहते हैं कि यही सच्चा प्रेम है। [3]