अब मेरैं निज ध्यान यह - श्री सूरदास, सूर सागर

अब मेरैं निज ध्यान यह - श्री सूरदास, सूर सागर

अब मेरैं निज ध्यान यह, रहौं जूठ नित खाइ ।
और बिधाता कीजियै, मैं नहिं छाँड़ौ पाइ॥

- श्री सूरदास, सूर सागर

ब्रह्मा जी कहते हैं, हे प्रभु, अब मैं बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे ग्वालों का अवशिष्ट प्राप्त हो जाए । मैंने यह जान लिया है कि आपने भी उन ग्वालों के भोजन से ही खाया है । उसी को खाकर मैं जीवन यापन करूँ। अब आप किसी और को विधाता बना दीजिए। जब तक आप मेरा यह संकल्प पूरा नहीं करते, मैं आपके चरणों को नहीं छोड़ूँगा, चाहे कुछ भी हो जाए।