कर कंजन जावक दै रूचि सौं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (6)

कर कंजन जावक दै रूचि सौं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (6)

(सवैया)
कर कंजन जावक दै रूचि सौं, बिछिया सजि कै ब्रज माड़िली के। [1]
मखतूल गुहे घुँघरू पहिराय, छला छिगुनी चित चाड़िली के॥ [2]
पगजेबै जराब जलूसन की, रवि की किरनै छवि छाड़िली के। [3]
जग वन्दत है जिनको सिगरो, पग बन्दत कीरिति लाड़िली के॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (6)

प्रेम में पूर्णतया आसक्त होकर श्रीकृष्ण अपने हाथों से श्रीराधा के चरण-कमलों में जावक लगाते हैं। ब्रज की प्यारी ठकुरानी, श्रीराधा के कमल जैसे चरणों को सुंदर बिछुओं से सुसज्जित करते हैं। [1]

वे अत्यंत सावधानीपूर्वक उनके कोमल चरणों पर पायल बाँधते हैं और रंगीली राधा की कनिष्ठा अंगुली में एक सुंदर छल्ला (अंगूठी) पहनाते हैं। [2]

श्रीराधा के चरणों में जड़ी हुई रत्नमयी पायल की चमक इतनी तेज है कि सूर्य की किरणें भी उसके आगे फीकी पड़ जाती हैं। [3]

श्री हठी जी कहते हैं—“समस्त संसार जिसकी वंदना करता है, वही श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक श्रीराधा के चरणों की आराधना करते हैं।” [4]