जबहिं द्वार वृषभानु के आए नंदकुमार।
तिहि छिन गति और भई रही न देह संभार॥
- ब्रज के दोहे
जब भी नंदनंदन श्री कृष्ण, बरसाना में श्री वृषभानुजी के महल के द्वार पर आते हैं तो प्रेम से वशीभूत होकर उनकी गति ही बदल जाती है एवं वे अपनी सुध बुध खोने लगते हैं।
तिहि छिन गति और भई रही न देह संभार॥
- ब्रज के दोहे
जब भी नंदनंदन श्री कृष्ण, बरसाना में श्री वृषभानुजी के महल के द्वार पर आते हैं तो प्रेम से वशीभूत होकर उनकी गति ही बदल जाती है एवं वे अपनी सुध बुध खोने लगते हैं।

