बिहारिनि लाडिली रस माती।
अति आनन्द भरी सुखरासी, मंद मंद मुसकाती॥ [1]
अद्भुत रूप कहत नहिं आवै, प्रीतम सँग किलकाती।
ललितकेलि तनमन मिलि विहरत, छिन छिन प्रति हुलसाती॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (67)
बिहारिनि रानी श्री राधा रस में उन्मत्त हैं। सुख की राशि लाड़िली, अति आनंद में भरकर, मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं। [1]
उनकी रूप-माधुरी अति अद्भुत है जो कहते नहीं बनती, वे प्रियतम श्री कृष्ण के संग हंस-खेल रही हैं। वे श्री लालजी (कृष्ण) के संग तन से तन, एवं मन से मन मिलकर सुंदर केली विहार में क्षण-क्षण हुलस रही हैं। [2]
अति आनन्द भरी सुखरासी, मंद मंद मुसकाती॥ [1]
अद्भुत रूप कहत नहिं आवै, प्रीतम सँग किलकाती।
ललितकेलि तनमन मिलि विहरत, छिन छिन प्रति हुलसाती॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (67)
बिहारिनि रानी श्री राधा रस में उन्मत्त हैं। सुख की राशि लाड़िली, अति आनंद में भरकर, मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं। [1]
उनकी रूप-माधुरी अति अद्भुत है जो कहते नहीं बनती, वे प्रियतम श्री कृष्ण के संग हंस-खेल रही हैं। वे श्री लालजी (कृष्ण) के संग तन से तन, एवं मन से मन मिलकर सुंदर केली विहार में क्षण-क्षण हुलस रही हैं। [2]

