(राग सारंग)
रसिक अनन्य हमारी जाति।
कुल देवी श्री राधा, बरसानौ खेरौ, व्रजवासिन सौ पाँति॥ [1]
गोत-गोपाल, जनेऊ-माला, सिखा सिखंडि, हरि-मंदिर भाल।
हरिगुन नाम वेद धुनि सुनियत, मूँज पखावज, कुस करताल॥ [2]
साखा जमुना, हरिलीला षट्कर्म, प्रसाद प्रान, धन रास।
सेवा विधि, निषेध जड़ संगति, वृत्ति सदा वृंदावन वास॥ [3]
स्मृति भागवत, कृष्ण नाम संध्या, तर्पन, गायत्री जाप।
वंशी रिषि, जजमान कल्पतरु, व्यास न देत असीस सराप॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (121)
हमारी जाति रसिक अनन्य है।
कुल देवी श्री राधा हैं, गांव हमारा बरसाना है और जाति-बिरादरी ब्रज वासियों के साथ है। [1]
गोत्र गोपाल हैं, यज्ञोपवति कण्ठीमाला है, मोर पक्ष शिखा है और भाल पर तिलक (हरि मंदिर) सुशोभित है। श्री हरि के गुण और नाम का गान वेद ध्वनि है, मूंज-बंधन पखावज है और कुशा-ग्रहण करताल है। [2]
श्री यमुना जी शाखा हैं, हरि लीला षट्कर्म हैं, प्रसाद प्राण है और धन-संपत्ति रास है। प्रभु सेवा विधि है, जड़ (भक्ति विहीन) की संगति निषेध है और निरंतर श्री वृन्दावन वास वृत्ति है। [3]
श्रीमद्भागवत स्मृति है, श्री कृष्ण नाम संध्या, तर्पण और गायत्री जाप है।
वंशी ऋषि है और पुलिन कल्पतरु यजमान हैं । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि कर्म-कांडियों की भांति मैं किसी को आशीर्वाद या शाप नहीं देता, किसी के प्रति मेरा राग-द्वेष नहीं है। [4]
रसिक अनन्य हमारी जाति।
कुल देवी श्री राधा, बरसानौ खेरौ, व्रजवासिन सौ पाँति॥ [1]
गोत-गोपाल, जनेऊ-माला, सिखा सिखंडि, हरि-मंदिर भाल।
हरिगुन नाम वेद धुनि सुनियत, मूँज पखावज, कुस करताल॥ [2]
साखा जमुना, हरिलीला षट्कर्म, प्रसाद प्रान, धन रास।
सेवा विधि, निषेध जड़ संगति, वृत्ति सदा वृंदावन वास॥ [3]
स्मृति भागवत, कृष्ण नाम संध्या, तर्पन, गायत्री जाप।
वंशी रिषि, जजमान कल्पतरु, व्यास न देत असीस सराप॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (121)
हमारी जाति रसिक अनन्य है।
कुल देवी श्री राधा हैं, गांव हमारा बरसाना है और जाति-बिरादरी ब्रज वासियों के साथ है। [1]
गोत्र गोपाल हैं, यज्ञोपवति कण्ठीमाला है, मोर पक्ष शिखा है और भाल पर तिलक (हरि मंदिर) सुशोभित है। श्री हरि के गुण और नाम का गान वेद ध्वनि है, मूंज-बंधन पखावज है और कुशा-ग्रहण करताल है। [2]
श्री यमुना जी शाखा हैं, हरि लीला षट्कर्म हैं, प्रसाद प्राण है और धन-संपत्ति रास है। प्रभु सेवा विधि है, जड़ (भक्ति विहीन) की संगति निषेध है और निरंतर श्री वृन्दावन वास वृत्ति है। [3]
श्रीमद्भागवत स्मृति है, श्री कृष्ण नाम संध्या, तर्पण और गायत्री जाप है।
वंशी ऋषि है और पुलिन कल्पतरु यजमान हैं । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि कर्म-कांडियों की भांति मैं किसी को आशीर्वाद या शाप नहीं देता, किसी के प्रति मेरा राग-द्वेष नहीं है। [4]

