किशोरी मोहि श्रीवन वास बसावौ।
सदां रहौं चरनन की दासी, यह अभिलाख पुजावौ॥ [1]
और न देखौं इन नैंनन सों, गुननहि हीय सिहावौ ।
प्रेमसखी तुमरे गुन गुन गुन, सुन सुन तुमैं रिझावौ ॥ [2]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (91)
हे किशोरी श्री राधे, मुझे श्री वृंदावन का वास प्रदान कीजिए, जहाँ मैं सदा आपके चरण-कमलों की दासी बनकर रह सकूँ। कृपा कर मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिए। [1]
मैं अपने नेत्रों से आपकी सुंदर छवि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखूँगी और आपके दिव्य गुणों को ही सदा अपने हृदय में धारण करूँगी। मैं अपने मुख से आपके गुणों का निरंतर गान कर, आपको सुनाकर सदा आपको रिझाऊँगी । [2]
सदां रहौं चरनन की दासी, यह अभिलाख पुजावौ॥ [1]
और न देखौं इन नैंनन सों, गुननहि हीय सिहावौ ।
प्रेमसखी तुमरे गुन गुन गुन, सुन सुन तुमैं रिझावौ ॥ [2]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (91)
हे किशोरी श्री राधे, मुझे श्री वृंदावन का वास प्रदान कीजिए, जहाँ मैं सदा आपके चरण-कमलों की दासी बनकर रह सकूँ। कृपा कर मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिए। [1]
मैं अपने नेत्रों से आपकी सुंदर छवि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखूँगी और आपके दिव्य गुणों को ही सदा अपने हृदय में धारण करूँगी। मैं अपने मुख से आपके गुणों का निरंतर गान कर, आपको सुनाकर सदा आपको रिझाऊँगी । [2]

