हित की रीति सबन ते न्यारी - श्री किशोरी अलि

हित की रीति सबन ते न्यारी - श्री किशोरी अलि

हित की रीति सबन ते न्यारी।
कै जानैं रस रास लड़ैती, कै पिय कुञ्जविहारी॥ [1]
भवन चतुर्दश माहिं नैकु कहुँ, नाहिन नेह चिह्नारी।
अली किशोरी मनहि लगाये, गरे लगावत प्यारी॥ [2]

- श्री किशोरी अलि

हित (प्रेम) की रीति सबसे विलक्षण है, जिसे या तो लड़ैती श्री राधा जानती हैं या कुंजविहारी श्री कृष्ण ही जानते हैं। [1]

इस प्रेम का एक चिन्ह भी समस्त चौदह लोकों में कहीं भी देखने को नहीं मिलता। श्री अलि किशोरी जी कहते हैं कि जो अपने मन को श्री राधा प्यारी में लगाता है, श्री प्यारी जू उसे प्रेमपूर्वक अपने गले से लगा लेती हैं। [2]