किशोरी मेरी हरो सकल भव बाधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (6)

किशोरी मेरी हरो सकल भव बाधा - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (6)

(राग देवगंधार व भैरव)
किशोरी मेरी हरो सकल भव बाधा।
मो सम पापी नहिं त्रिभुवन में, सॉँच कहूँ श्रीराधा॥ [1]
काम क्रोध मद लोभ मोह की, लागी बहुत उपाधा।
विषय वासना लिप्त सदा मन, उर अभिमान अगाधा॥ [2]
अवगुन मेरु बराबर मेरे, सुकृत नेक न साधा।
“रूपमाधुरी” सब विधि बिगड़ी, केवल नाम अराधा॥ [3]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (6)

हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी समस्त भव-बाधाओं का हरण कीजिए, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ। इस त्रिभुवन में मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ। [1]

मैं काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं मद की बहुत सी उपाधियों से मैं अलंकृत हूँ। मेरा मन सदैव विषय-वासना में डूबा रहता है, और मेरे हृदय में अभिमान की पराकाष्ठा है। [2]

मेरे दोष मेरु पर्वत के समान विशाल हैं, और मैंने कभी सुकृत्य करने का प्रयास भी नहीं किया। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं, मेरा जीवन हर प्रकार से बिगड़ चुका है, अब तो केवल आपके नाम का ही सहारा है। [3]