रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)

रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)

रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं, काढ़ी अलक लेड़ैती राधा।
प्राकृत विविधवासना वबिजनु, हरत निरन्तर अमित अवाधा॥ [1]
आनन्द की हू आनम्ददायिनी, परमादि व्यप्रभा सुखसाधा।
श्रीरामराय की जीवनि स्वामिनि, अविचल प्रनय आल्हाद अगाधा॥ [2]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)

अनन्य रसिकों ने श्री कृष्ण प्रेम-रस रूपी धन की साक्षात मूर्तिमान स्वरूपा अर्थात् रंगीली श्री राधा को ही सदा लाड़ लड़ाया है, जो समस्त जीवों की विविध प्रकार की प्राकृत वासनाओं का अविरल रूप से हरण करती हैं। [1]

श्री राधा स्वयं आनंद स्वरूप श्री कृष्ण को भी आनंद प्रदान करने वाली परम आद्या हैं, जिनकी प्रभा असीम है और जो दिव्य सुख की अनंत दाता हैं। श्री रामराय जी कहते हैं, “श्री राधा ही मेरी संपूर्ण जीवन और स्वामिनी हैं, जो अविचल प्रेम एवं अपार आल्हाद की महासागर हैं।” [2]