फिरति रहे वन भूमि में झूमि नैन अकुलाय  - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)

फिरति रहे वन भूमि में झूमि नैन अकुलाय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)

फिरति रहे वन भूमि में, झूमि नैन अकुलाय।
घूम घूम तन लोट के, उठे रूप गुन गाय ॥

- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (21)

मैं श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि में आनंदपूर्वक झूमते हुए विचरण करूँ, जहाँ मेरे नयन सदैव दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण के दर्शन की लालसा में व्याकुल रहें। वहाँ की रज में अपने तन को बार-बार लोटाऊँ, फिर उठकर प्रिया प्रियतम के अनुपम रूप और गुणों का प्रेमपूर्वक गान करूँ।​