जै जै श्रीवृंदावन देवी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पच्चासा (01)

जै जै श्रीवृंदावन देवी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पच्चासा (01)

जै जै श्रीवृंदावन देवी।
जो देवन कौ देव कन्हाई, सौऊ जा पद सेवी ॥ [1]
अगम अपार जगत सागर के, जाके गुण गन खेवी।
‘हरीचंद’ की यहै बीनती, कबहूँ तो सुधि लेवी॥ [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पच्चासा (01)

श्री वृंदावन धाम की पटरानी, श्री राधारानी की जय हो! स्वयं देवों के देव, श्रीकृष्ण भी उनके चरण कमलों की सेवा करते हैं। [1]

वे अपने अनगिनत गुणों से भक्तों को इस भौतिक संसार के कठिन और दुर्गम सागर को पार करने में सदैव सहायता करती हैं। श्री भारतेन्दु हरिश्चंद्र विनम्रता से प्रार्थना करते हैं, “मेरी यही विनती है कि कभी मुझ पर भी आप अपनी कृपा दृष्टि बरसाएँ।” [2]