स्याम भये बस नागरि कैं - श्री सूरदास, सूर सागर

स्याम भये बस नागरि कैं - श्री सूरदास, सूर सागर

(राग भैरव)
स्याम भये बस नागरि कैं ।
नैन कटाच्छ बंक अवलोकनि, रीझे घोष उजागरि कैं॥ [1]
चित मधुकर, रस कमल-कोस कौ, प्यारी बदन सुधागरि कौं। 
लोक-लाज-संपुट नहिं छूटत, फिरि-फिरि आवत वागरि कौं॥ [2]
मिलन प्रकास मनावत मन-मन, कहा कहौं अनुरागरि कौं। 
'सूर' स्याम बस-बाम भये हैं, धन ऐसी बड़भागरि कौं॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर

श्री कृष्ण नागरि (श्री राधा) के वशीभूत हो गये हैं।
वे उन घोष (गोपालक) कुल को उजागर करने वाली श्री राधा के नेत्र-कटाक्ष और उनकी टेड़ी चितवन पर रीझे हुए हैं। [1]

अपनी प्यारी के मुख रूप चंद्रमा के कारण श्री कृष्ण का चित्त रूप भ्रमर रस रूप कमल-कोष में फँसा हुआ है।
वे लोक-लाज आदि बंधनों से घिरे हुए हैं, तथापि श्री राधा के दिव्य प्रेम के जाल में सदा फँसे रहते हैं । [2]

श्री कृष्ण मन ही मन श्री राधा से संयोग रूपी उत्सव मनाते हैं । भला ऐसे अद्भुत अनुराग के लिए क्या कहा जाय ! 
सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण जिन बामा (नारी) के वश में हो रहे हैं, ऐसी बड़भागिनी (श्री राधा) धन्य है ! [3]