विहारिन तुम बिन पल न सुहात।
दिन नहिं चैन रात नहि निद्रा, अति आतुर अकुलात॥ [1]
जीवन बीत गयौ रह्यौ थोरी, सोऊ बीत्यौ जात।
कृपा दृष्टि करि सींच्यौ स्वामिनि, नेह लता कुम्हलात॥ [2]
कौन-सी चूक परी मो प्यारी, सो नहिं जानी जात।
विमल अचल पद भक्ति देहु द्रुत, सुनहु प्रणत की बात॥ [3]
- श्री विमलाबाई
हे बिहारिनि श्री राधा, आपके बिना मुझे एक पल भी अच्छा नहीं लगता।
दिन में मुझे चैन नहीं रहता और रात में नींद नहीं आती । मेरा ह्रदय आपको प्राप्त करने के लिए अति व्याकुल रहता है। [1]
मेरा अधिकांश जीवन तो बीत चुका है, अब बस थोड़ा ही शेष हैं, जो धीरे-धीरे बीतते जा रहा है।
हे स्वामिनी, मेरे ह्रदय में जो प्रेम की लता है, वह मुरझाने लगी है, कृपा कर अपनी करुणा की वर्षा से इसे सींच दीजिए। [2]
हे प्यारी जू, मुझसे ऐसी कौन सी भूल हुई है, मैं यह जान नहीं पा रही हूँ।
श्री विमला बाई कहती हैं कि मुझे शीघ्र अपने चरण कमलों की अचल भक्ति प्रदान कीजिये। कृपा कर, अपनी शरणागत की यह विनती सुन लीजिए! [3]

