(कुंडलियाँ)
नाहीं द्वैताद्वैत हरि, नहीं बिसिष्टाद्वैत।
बँधे नहीं मतवाद में, ईश्वर इच्छाद्वैत॥ [1]
ईश्वर इच्छाद्वैत, करै सब ही की पोषन।
आप रहैं निर्लेप, भक्त सौं मानै तोषन॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, संग डोलै गलबॉँहीं।
करै मनोरथ सिद्ध उचित अनुचित कछु नाँहीं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (6)
श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं। [1]
परम स्वतंत्र श्री कृष्ण सबका पोषण करते हैं, लेकिन स्वयं सबसे निर्लेप रहते हैं एवं अपने भक्तों से ही संतोष पाते हैं। [2]
रसिक अनन्य भक्तों के साथ गले में बाँहें डालकर घूमते हैं, और उचित अनुचित का विचार किए बिना ही उनकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं । [3]
नाहीं द्वैताद्वैत हरि, नहीं बिसिष्टाद्वैत।
बँधे नहीं मतवाद में, ईश्वर इच्छाद्वैत॥ [1]
ईश्वर इच्छाद्वैत, करै सब ही की पोषन।
आप रहैं निर्लेप, भक्त सौं मानै तोषन॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, संग डोलै गलबॉँहीं।
करै मनोरथ सिद्ध उचित अनुचित कछु नाँहीं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (6)
श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं। [1]
परम स्वतंत्र श्री कृष्ण सबका पोषण करते हैं, लेकिन स्वयं सबसे निर्लेप रहते हैं एवं अपने भक्तों से ही संतोष पाते हैं। [2]
रसिक अनन्य भक्तों के साथ गले में बाँहें डालकर घूमते हैं, और उचित अनुचित का विचार किए बिना ही उनकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं । [3]

