जो काटत बंधन मोहन को - ब्रज के सवैया

जो काटत बंधन मोहन को - ब्रज के सवैया

(सवैया)
जो काटत बंधन मोहन को, सो मोहन मोह बढ़्यो हौं देख्यो। [1]
नैनन बैनन सैनन मेँ, दिन रैन स्नेह चढ़्यो हौं देख्यो॥ [2]
श्याम के चित पे राधिका को, चलचित्र विचित्र कढ़्यो हौं देख्यो। [3]
कारे पे ना कोउ रंग चढ़े, या पै गोरी को रंग चढ़्यो हौं देख्यो॥ [4]

- ब्रज के सवैया

जो मोह के बंधन से छुड़ाने वाले हैं, उन श्रीकृष्ण के हृदय में श्रीराधा के प्रति बढ़ते हुए मोह को मैंने देखा। [1]

श्रीकृष्ण के नेत्रों में, उनकी वाणी में और उनके आचरण में, श्रीराधा के लिए दिन-रात बढ़ते हुए प्रेम को मैंने देखा। [2]

श्रीश्यामसुंदर के चित्त पर श्रीराधिका की छवि चलचित्र-सी अंकित मैंने देखी। [3]

काले वर्ण के श्रीकृष्ण पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता, परंतु गोरी श्रीराधा का रंग उन पर चढ़ा हुआ मैंने देखा। [4]