मेरे मन सब भाँति बिगारी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (1)

मेरे मन सब भाँति बिगारी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (1)

मेरे मन सब भाँति बिगारी।
अगम निगम मरजाद कान कुल, मुख विराय उरसों निखारी॥ [1]
देह निकुंज निवास स्वामिनी, करुणा करि वलि लेहु संभारि।
ललितकिशोरी त्रास नासिहे, एक आस सरनागत प्यारी॥ [2]

- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (1)

मेरे मन ने हर किसी से सब भाँति बिगाड़ ली है। वेदों एवं शास्त्रों की मर्यादा तथा लोक-लाज, कुल आदि की मर्यादाओं से मुख मोड़कर, उसे अपने ह्रदय से सदा-सदा के लिए निकाल कर फैंक दिया है। [1]

हे स्वामिनी श्री राधे! अब मैं अनन्य रूप से एक मात्र आपके ही शरणागत हूँ, आप करुणा करके मुझे संभाल लीजिए और निकुंज वास का वरदान दीजिए। श्री ललित किशोरी जी कहते हैं, “हे प्यारी जू, मेरे समस्त भय का नाश कीजिए, क्योंकि मुझे तो अब केवल आपही का आसरा है।” [2]