(राग बिहाग)
मोहि श्री बल्लभ ही कौ भरोसौ।
अन्य देव कों जानों न मानों, इनकौ आसरौ खरौ सौ॥ [1]
समझ बिचार देख मन मेरे, बार-बार कहों तो सौ।
'रसिक' सुधा-सागर को छाँड़ि कै, क्यों पीवत जल ओसौ॥ [2]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
मुझे एकमात्र श्री वल्लभ पर ही भरोसा है । उनके अतिरक्त न तो मैं किसी अन्य देव को जानता हूँ न मानता हूँ, केवल उनका अनन्य आसरा ही सच्चा है। [1]
हे मेरे मन, थोड़ा समझ-विचार कर देख, मैं तुझसे बार-बार कहता हूँ कि रसामृत सागर को छोड़कर, तू क्यों ओस की बूँद पी रहा है। [2]
मोहि श्री बल्लभ ही कौ भरोसौ।
अन्य देव कों जानों न मानों, इनकौ आसरौ खरौ सौ॥ [1]
समझ बिचार देख मन मेरे, बार-बार कहों तो सौ।
'रसिक' सुधा-सागर को छाँड़ि कै, क्यों पीवत जल ओसौ॥ [2]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
मुझे एकमात्र श्री वल्लभ पर ही भरोसा है । उनके अतिरक्त न तो मैं किसी अन्य देव को जानता हूँ न मानता हूँ, केवल उनका अनन्य आसरा ही सच्चा है। [1]
हे मेरे मन, थोड़ा समझ-विचार कर देख, मैं तुझसे बार-बार कहता हूँ कि रसामृत सागर को छोड़कर, तू क्यों ओस की बूँद पी रहा है। [2]

