यही सार को सार है मनबा - श्री जुगल सहचरी

यही सार को सार है मनबा - श्री जुगल सहचरी

यही सार को सार है मनबा, लाल प्रिया मुख कहियौ।
बस वृन्दावन संग रसिकन कौ, सतगुरु शरणे रहियौ॥ [1]
रसिक नृपति रस रीति बखानी, दृढ़ कर ताकौ गहियौ।
'जुगलसहचरी' होय महल में, अलभ्य लाभ जु लहियौ॥ [2]

- श्री जुगल सहचरी

हे मन, सार की यही बात है कि अपने मुख से निरंतर श्री राधा-कृष्ण का नाम जपो या उनका संकीर्तन करो। इसलिए तू श्री वृंदावन में वास कर, रसिक संतों का संग कर और सतगुरु की शरण में रह। [1]

श्री जुगल सहचरी जी कहते हैं, “हे मन, रसिक नृपति (श्री स्वामी हरिदास जी/ श्री हित हरिवंश जी) ने जिस रस-रीति का प्रकाश किया है, उसका दृढ़ता पूर्वक पालन करो और श्री श्यामाश्याम के निज महल में उपस्थित रहकर उनकी सेवा का दुर्लभ लाभ प्राप्त करो।” [2]