श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (109)

श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (109)

(सवैया)
श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत, रीझैं देत सर्वसु स्वाँमी। [1]
अमनैंक अनन्यनि कौ धन धर्म, मर्म न जानैं कर्मठ काँमी॥ [2]
श्रीबिहारिनिदास विस्वास बिना, ललचात लजात लहै नँहि ताँमी। [3]
और कहा वरनें कवि बापुरौ, बादि बकैं श्रम कैं मति भ्राँमी॥ [4]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (109)

जो जीव अनन्य भाव से श्री बिहारी-बिहारिनी का प्रेमपूर्वक यशोगान करता है, उस पर अनन्य नृपति रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी अत्यंत प्रसन्न होकर विवशतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं। [1]

प्रिया-प्रियतम का यह रस केवल अनन्य रसिकों का धन है, जिसका मर्म कर्मकांडी और सकामी लोग नहीं समझ सकते। [2]

सांसारिक इच्छाओं में डूबे कर्मकांडी लोग इस गूढ़ रहस्य को नहीं समझ सकते, वे केवल लोभ में अंधे होकर व्यर्थ भागते रहते हैं, फिर भी उन्हें लज्जा नहीं आती। [3]

इस विशुद्ध प्रेम के मर्म को जब बेचारे महाकवि भी वर्णन नहीं कर सकते, तब भ्रामक लोग तो व्यर्थ ही बकवास किया करते हैं। अर्थात् सच्चे प्रेमी का ऐसा स्वभाव होता है कि वह अपने प्रेमास्पद के गुणों को सुनकर ऐसा रीझ जाता है कि उसे अपना सर्वस्व अर्पण करने को तत्पर हो जाता है। [4]