सो वह ग्रंथ पुरान सुनों नहिं - श्री सरस माधुरी जी, सरस सागर भाग 3, पद फुटकर

सो वह ग्रंथ पुरान सुनों नहिं - श्री सरस माधुरी जी, सरस सागर भाग 3, पद फुटकर

सो वह ग्रंथ पुरान सुनों नहिं, जामें बिहार न दंपति गायो।
नाहिं महातम श्री बन को, ब्रज की रज को कहू जाय न पायो॥ [1]
तासों करूँ नहिं वारतालाप, जिन्हें नहिं दंपति को जस भायो।
देखो नहिं तिनहें नैंन तें, कहैं सरस जिन्हें नहिं प्रेम सुहायो॥ [2]

- श्री सरस माधुरी जी, सरस सागर भाग 3, पद फुटकर

वृंदावन के नित्य विहार रस के उपासक को वह ग्रन्थ अथवा पुराण नहीं सुनना चाहिए जिसमें दम्पति श्री श्यामाश्याम के नित्य विहार, श्री वृन्दावन का माहत्म्य एवं ब्रज-रज की महिमा का वर्णन न हो। [1]

जिसे श्री राधा कृष्ण के यश का कथन-श्रवण अच्छा नहीं लगता उससे वार्तालाप नहीं करनी चाहिए । श्री सरस माधुरी जी कहते हैं कि जिनको लाड़ली लाल को प्रेम से लाड़ लड़ाना नहीं सुहाता उनके तो मैं कभी दर्शन भी नहीं करना चाहता । [2]