बसियें बास सुबस बरसानों - श्री द्वारकेश जी

बसियें बास सुबस बरसानों - श्री द्वारकेश जी

बसियें बास सुबस बरसानों।
जहाँ राजत वृषभानु लडै़ती, रसिक कुंवरि जग जानों॥ [1]
जिन के चरण पलोटत प्यारो, तिनही को गहि बानों।
युगल केलि नव कुंज सदन में, 'द्वारकेश' मनमानों॥ [2]

- श्री द्वारकेश जी

जहाँ का वास अति सुन्दर और पावन है, ऐसे बरसाना धाम की शरण में वास करो, जहाँ वृषभानु नंदिनी श्री राधा विराजमान हैं, जिन्हें रसिक कुंवरि के नाम से जगत में जाना जाता है। [1]

श्री कृष्ण जिनके चरणों की सेवा करते हैं, उन्हीं श्री राधा के आंचल को (शरण ग्रहण) मैंने दृढ़ता से थाम लिया है। श्री द्वारकेश जी कहते हैं, “उनकी ही कृपा से मुझे युगल श्री राधा-कृष्ण की निकुंजमहल में परम अंतरंग केली में मनोवांछित सेवा प्राप्त हुई है।” [2]