रम्भा रमासी उमासी हठी विमला नवला - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (83)

रम्भा रमासी उमासी हठी विमला नवला - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (83)

(सवैया)
रम्भा रमासी उमासी ‘हठी’ विमला नवला रति रूप छली सी। [1]
चाँदनी चम्पा चमीकर सी चपला चमकाहत जात घली सी॥ [2]
भागन आज लखी भरी नैनन रावरी आवत देखि भली सी। [3]
जात चली गली भानुलली अली मंजुल कोमल कंज कली सी॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (83)

रंभा, लक्ष्मी, पार्वती, विमला, नवला और रति जैसी रूपवती भी श्री राधा की रूप-माधुरी को निहारकर मानो ठगी-सी खड़ी रह जाती हैं। [1]

उनकी कांति चंद्र-किरण जैसी, वर्ण चंपा-फूल-सा, और शोभा आकाश में चमकती बिजली जैसी है। [2]

आज मेरा ऐसा सौभाग्य उदित हुआ कि इन नेत्रों से मैंने स्वयं श्री राधा के दर्शन किए। मैंने उन्हें स्पष्ट रूप से अपनी ओर आते हुए देखा। [3]

कमल-कली जैसी कोमल राधा सखियों के संग हँसती-खिलखिलाती ब्रज की मनोहर गलियों में चली जा रही थीं। [4]