विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (1)

विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (1)

विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः, शूली शिवः पृष्ठतः। वामे पाशधरः प्रयाति वरुणो, वज्री हरिर्दक्षिणे॥
स्वच्छन्दं व्रजतो नरस्य गृणतो, राधेति नामाक्षरम्। नृत्यन्त्यप्सरसः प्रसूननिचयान् वर्षन्ति देव्यो मुदा॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (1)

जो व्यक्ति मार्ग में गमन करते हुए केवल ‘राधा’ नाम का स्वच्छन्द उच्चारण करता है उसका बहुमान करते हुए आगे-आगे चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान, पीछे पीछे शूलधारी श्रीशिवजी, वाम भाग में पाशहस्त श्रीवरुणदेव और दक्षिणभाग में वज्रधारी इन्द्रदेव चलते हैं, तथा अप्सरायें आगे-आगे नृत्य करती हैं और देवाङ्गनायें कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा हर्ष से करती हैं।