रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (45)

रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (45)

(कवित्त)
रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों,
सुखमा सजीली वनराज की दिखावें हैं। [1]
कैसे द्रुम बेली रंगरेली फल पल्लव सों,
झुक-झुक झूम-झूम भूम चूम जावें हैं॥ [2]
सहित सुवास फल फूलकें झरें अतूल,
चारों दिसि ही में मनो इन्द्र झर लावें हैं। [3]
डारन पै बैठे अनुरागन सों सारो सुक,
सुभग सजीली रसना सों तान गावें हैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (45)

रसिक बिहारी श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी श्री राधा वृंदावन की सजीली छवि का दर्शन करवा रही हैं। [1]

कैसे वृक्ष और लताएँ, रंग-बिरंगे फूलों और फलों से सजी, झुककर और लहराकर आनंद में मगन, धरती (रज) को स्पर्श करती हैं, मानो श्रद्धा से नमन कर रही हों। [2]

अद्वितीय सुगंध के साथ, फूल और फल इतनी प्रचुरता से गिरते हैं, मानो स्वयं इंद्र चारों दिशाओं से उन्हें बरसा रहे हों। [3]

शाखाओं पर बैठे तोते एवं अन्य पक्षी प्रेम से भरे हुए मधुर और मनमोहक स्वरों में गीत गाते हैं, जिससे वातावरण अत्यंत आनंदमय हो उठता है। [4]