मैं दरसन बिन अनमनी, बैठोंगी मुख मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.4)

मैं दरसन बिन अनमनी, बैठोंगी मुख मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.4)

मैं दरसन बिन अनमनी, बैठोंगी मुख मोर।
कब मोसों कहैं लाड़ली, क्यौं रूषौ मन तोर॥
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.4)

श्री राधा के दर्शन प्राप्त न होने पर मैं व्याकुल होकर उनसे प्रेम में मान कर, मुख मोड़कर बैठूँगी। ऐसा कब होगा कि तब मेरी लाड़ली (राधा) आकर मुझसे कहेंगी, “तुम्हारा हृदय क्यों व्याकुल है, तुम क्यों मुझसे रूठी हुई हो?”