जब लगि देखौं तुव मुख सुन्दरि, तब लगि प्रान रहत हैं तन में। [1]
अलक पलक पट ओट अँतर तें, कोटि कलप जुग बीतत छन में॥ [2]
रुखो लागत सब अंग मोकों, नेक रुखाई भौंह करन में। [3]
अलबेली अलि नवल कँवल सो, फुल्यो रहै मुख इन नैनन में॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (172)
श्री कृष्ण कहते हैं - हे सुंदरी श्री राधे, जब तक मैं आपके मुखचन्द्र को निहारता हूँ तभी तक तन में प्राण रहते हैं। [1]
आपके मुख दर्शन में अलकें एवं पलकों के अंतर पड़ते ही ऐसा अनुभव होता है जैसे कोटि-कोटि कल्प एवं युग एक क्षण में बीत गए हों। [2]
जब आपकी भृकुटि थोड़ी सी तन जाती है तब मेरे सब अंग रूखे लगने लगते हैं। [3]
मेरी यही अभिलाषा है कि आपका मुखचन्द्र नवीन कमल के समान खिला हुआ सदैव मेरी आँखों में बसा रहे। [4]

