श्रीवृन्दावन वसौं निरंतर, यही चित्त अभिलाषा है - श्री ललित माधुरी

श्रीवृन्दावन वसौं निरंतर, यही चित्त अभिलाषा है - श्री ललित माधुरी

(राग काफी)
श्रीवृन्दावन वसौं निरंतर, यही चित्त अभिलाषा है।
जुगुलमाधुरी पान करौं नित, छिनछिन यही हुलासा है॥ [1]
सदा वसंत जहाँ नव पल्‍लव, इकरस बारौ मासा है।
ललितमाधुरी ललितत्रिभंगी, ललितहि रास विलासा है॥ [2]

- श्री ललित माधुरी

मैं निरंतर श्री वृन्दावन में निवास करूँ, यही मेरे चित्त की अभिलाषा है।
जहाँ प्रत्येक क्षण युगल किशोर श्री श्यामाश्याम के सुन्दर रूपमाधुरी का नित्य पान करूँगा, यही मेरे ह्रदय का उल्लास है। [1]

जहाँ सदैव वसंत ऋतु व्याप्त रहती है एवं नवीन पुष्प खिले रहते हैं, बारहों मास एक ही रस (युगल केलि लीला रस) बरसता रहता है।
श्री ललित माधुरी जी कहते हैं कि "मेरे प्रभु श्री कृष्ण की रूपमाधुरी सुन्दर है, उनकी त्रिभंग मुद्रा सुन्दर है एवं उनके रास-विलासादि लीलाएं भी सुन्दर हैं।" [2]