श्री राधे राधे गाऊँगी।
अतुल रूप राशि रस सीमा, देखत रूप लुभाऊँगी॥ [1]
पुतरिन में करि बन्द नैंन के, पलक कपाट लगाऊंँगी।
रसिकन संग करूँ मैं निशिदिन, रसिक चरन लिपटाऊंँगी॥ [2]
पी रस ब्रज वीथिन मंह डोलूँ, लोक लाज बिसराऊंगी।
'कृष्णा' कहति उनहिं के कान, बाबरि नाम धराऊंगी॥ [3]
- तपस्विनी कृष्णा माँ
मैं श्री राधे राधे गाऊँगी।
अतुल रूप की राशि एवं रस की सीमा श्री राधा की रूपमाधुरी को देख-देख लुभाऊँगी। [1]
उनकी सुन्दर छवि को आँखों में बसाकर मैं पलक रुपी कपाट बंद कर लूँगी ।
मैं नित्य रसिकों का संग करुँगी एवं नके चरणों की पावन रज को अपने मस्तक पर धारण करूँगी। [2]
लोक-लाज का त्याग कर श्री राधा के दिव्य रस को पीयूँगी एवं ब्रज की गलियों में विचरण करुँगी।
श्री कृष्णा माँ कहतीं हैं कि "श्री राधा के प्रेम में उन्मत्त होकर बावरी नाम धराऊंगी।" [3]

