(राग केदारौ)
तेरे नूपुर - धुनि री प्यारी स्रवन सुनी।
अचल चले, चल रहे री रहित गति,
खग मृग ब्रत मानों धर्यौ है मुनी॥ [1]
नव निकुंज बर सुहस्त साँवरौ लाल,
सेज्या रचित बहु कुसुम चुन - चुनी।
श्रीबीठलविपुल की रीति, मिली हैं मदन जीति,
तू सिरमौर सब गुननि - गुनी॥ [2]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (33)
हे प्यारी (श्री राधा) ! आपके चरणारविंद से नूपुर ध्वनि की सुंदर झंकार का श्रवण कर, श्रीवृन्दावन की समस्त अचल सम्पत्ति चलायमान हो रही है एवं चलायमान अचल हो रहे हैं। खग- मृग आदि पक्षीगण एवं अन्य जन्तु मुनियों की भाँति रस-समाधि में तदाकार हो रहे हैं। [1]
कमनीय निकुंज मन्दिर में अपने सुन्दर हाथों से पुष्पों को चुन-चुनकर साँवरे लाल ने सुंदर शय्या की रचना की है। इस समय विपुल रस का सुयोग हो रहा है। हे सर्वशिरोमणि प्रिया ! इस प्रेम युद्ध में आप मदन को पराजित करने वाली समस्त गुणों में अग्रगण्य हैं । [2]

