अपि कीटः पतंगो वा तिर्यग्योनिगतोऽपि वा। चतुर्भुजास्तु ते सर्वे भवन्तीति विनिश्चितम्॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.34) मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।