कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

कोटि जन्म लगि यह हठ मोरी। [1]
बिनु पद कंज और नहिं लैहौं, करुणा सिन्धु किशोरी। [2]
तीन लोक सम्पति नहिं चाहौं, रिधि-निधि-सिद्धि करोरी॥ [3]
कै तौ मिलौ कै दीन रटावौ, हौं तौ सब विधि तोरी। [4]
कोटि जन्म वरु रोवत काटौं, हठ ना तजिहौं 'भोरी'॥ [5]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (331)

हे करुणा की अगाध समद्र, श्री राधा प्यारी जू! अब आपके चरण कमलों के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है, चाहे उनको प्राप्त करने के लिये मुझे करोड़ों जन्म ही क्यों न लेने पड़ें। यही मेरा दृढ़ निश्चय है। [1 & 2]

मुझे तीनों लोकों की सम्पत्ति, करोड़ों ऋद्धियों, नव निद्धियों एवं अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने की कोई लालसा नहीं है। [3]

अब आप या तो दर्शन देकर मुझे कृतार्थ करो अथवा विरह की पीड़ा को सहते हुए मुझसे अपने नाम की रटना लगवाती रहो; क्योंकि मैं तो अब सब भाँति तुम्हारी हूँ । [4]

श्री भोरी सखी कहती हैं कि मुझे आपके विरह में करोड़ों जन्म रोकर क्यों न व्यतीत करना पड़े, लेकिन मैं अपना हठ नहीं छोडूंगी। [5]