अनन्य रसिक वृंदावन प्यारे, मम जीवन रखवारे।
कृपा प्रसादी देहूँ मोहे, तव या रस पग धारे॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी
कृपा प्रसादी देहूँ मोहे, तव या रस पग धारे॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी
हे श्री वृंदावन धाम के प्यारे अनन्य रसिकों! आप ही मेरे प्राणों के सच्चे रक्षक हैं। मुझे ऐसी कृपा प्रसादी दीजिए कि मैं भी इस अद्भुत रसोपासना मार्ग का अधिकारी बन सकूँ।

![अनन्य रसिक वृंदावन प्यारे - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी](https://images.brajrasik.org/671377b97380110003f631f2-m.jpeg)