प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (23)

प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (23)

प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै।
जीवन मरन सदा की संगनि, जा बिनु यह तन छीजै॥ [1]
सौर अधम विषई अति लंपट, कुंवरि नाम उच्चारों।
करी लवंग लता सखियन में, अपनों विरद प्रतिपारों॥ [2]
निगम अगोचर दुर्लभ तरु वपु, काहू ध्यान न आवै।
सो राधा प्रीतम प्रेमाबस, रसिकन सुख बरसाबै॥ [3]
परम कृपाल प्रेम बस स्वामिन, सुख चाहत मन मेरौ।
तौ भजि श्री वृषभान सुता कौ, ‘बंसी’ बसहि सुनेरो॥ [4]

- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (23)

यदि प्रेम करना है तो श्री राधा से ही कीजिए क्योंकि वे ही जीवन और मरण में अर्थात् सदा साथ निभाने वाली हैं, जिनके बिना यह मनुष्य शरीर धारण करना व्यर्थ है। [1]

चाहे कोई कितना ही अधम, विषयी एवं अति लम्पट क्यों न हो परंतु जब वे आरत भाव से भरकर कुँवरि श्री राधा का नाम उच्चारण करता है, तो श्री राधा अपने परम कृपालुता के स्वभाव से वशीभूत होकर, उसे अपनी सखियों में स्थान दे देती हैं। [2]

श्री राधा आगम-निगम से परे हैं, उनका रूप किसी के ध्यान में नहीं आ सकता। ऐसी श्री राधा प्रियतम के प्रेम से वशीभूत होकर, रसिकों पर सदा सुख बरसाती हैं। [3]

श्री राधा महारानी परम कृपालु हैं जो केवल प्रेम के वश में है। हे मेरे मन! यदि तू सदा सुख चाहता है तो ऐसी परम दयाल  स्वामिनी का अनन्य भजन कर, जिससे तुझे उनके निकट वास का सुअवसर प्राप्त हो जायेगा। [4]