(कवित्त)
कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में,
कल कल करता कालिन्दी का किनारा हो। [1]
तीखे दृग तान मंजु मुरली बजाता हुआ,
बेश नटवर खड़ा नन्द का दुलारा हो॥ [2]
रास का प्रबन्ध करें ललिता रंगदेवी जी,
मण्डल रचाया गया भानु-सुता द्वारा हो। [3]
प्रेमावतार कृष्ण करता हो विहार जहाँ,
प्रेमियोंको क्यों न फिर वृन्दावन प्यारा हो॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (33)
जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो। [1]
जहाँ नटवर वेशधारी, तीखी चितवन से प्रेम बाण चलाते, मधुर मुरली बजाते हुए नंदलाल श्रीकृष्ण खड़े हों। [2]
जहां वृषभानु नंदिनी श्री राधा द्वारा रास-मण्डल रचाया गया हो एवं ललिता,रंगदेवी, आदि सखियाँ रास का प्रबंध कर रही हों। [3]
डंडी स्वामी श्री हरेकृष्ण जी कहते हैं कि "जहाँ प्रेम के अवतार श्री कृष्ण विहार करते हों, ऐसा वृन्दावन धाम प्रेमी भक्तों को भला क्यों न प्यारा होगा।" [4]
कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में,
कल कल करता कालिन्दी का किनारा हो। [1]
तीखे दृग तान मंजु मुरली बजाता हुआ,
बेश नटवर खड़ा नन्द का दुलारा हो॥ [2]
रास का प्रबन्ध करें ललिता रंगदेवी जी,
मण्डल रचाया गया भानु-सुता द्वारा हो। [3]
प्रेमावतार कृष्ण करता हो विहार जहाँ,
प्रेमियोंको क्यों न फिर वृन्दावन प्यारा हो॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (33)
जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो। [1]
जहाँ नटवर वेशधारी, तीखी चितवन से प्रेम बाण चलाते, मधुर मुरली बजाते हुए नंदलाल श्रीकृष्ण खड़े हों। [2]
जहां वृषभानु नंदिनी श्री राधा द्वारा रास-मण्डल रचाया गया हो एवं ललिता,रंगदेवी, आदि सखियाँ रास का प्रबंध कर रही हों। [3]
डंडी स्वामी श्री हरेकृष्ण जी कहते हैं कि "जहाँ प्रेम के अवतार श्री कृष्ण विहार करते हों, ऐसा वृन्दावन धाम प्रेमी भक्तों को भला क्यों न प्यारा होगा।" [4]

