सुल्लभ तें अति सुलभ है, दुल्लभ तें अति दूरि ।
कुंज बिहारिनी लाड़िली, हमरी जीवन मूरि ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (271)
सुलभ से भी अति सुलभ और दुर्लभ से भी अति दुर्लभ—ऐसी हैं मेरी कुंज विहारिणी, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), जो मेरे जीवन का आधार हैं ।
कुंज बिहारिनी लाड़िली, हमरी जीवन मूरि ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (271)
सुलभ से भी अति सुलभ और दुर्लभ से भी अति दुर्लभ—ऐसी हैं मेरी कुंज विहारिणी, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), जो मेरे जीवन का आधार हैं ।

