(कवित्त)
ब्रह्मा हूँ के ध्यान में न आवै कभू एक क्षण,
संकर समाधि लाय धरत ध्यान गाढ़ौ है। [1]
रिषि और मुनि जाको रैन दिन धरैं ध्यान,
ध्यान में न आवै कभू तासौ हेत बाढ़ौ है॥ [2]
सोई निरंजन जाकी माया कौ न आवै अंत,
ध्यानी ध्यान लाय रहें सहैं धूप जाढ़ौ है। [3]
देखौ ये भाग्य ब्रजवनितान के आली आज,
है कैंहूँ अनंत नवनीत माँगै ठाढ़ौ है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
जो ब्रह्मा के ध्यान में एक क्षण के लिए भी नहीं आते, जिनका शंकर जी पूर्ण एकाग्रता से समाधि लगाकर ध्यान कर रहे हैं। [1]
ऋषि और मुनि, जो दिन-रात उनका ध्यान करते हैं, फिर भी वे कभी उनके ध्यान में नहीं आते नहीं आते, जिनसे उनका विशेष प्रेम है। [2]
वही भगवान श्री कृष्ण जिनकी माया ने सारे विश्व को नचा रखा है, जिनके लिए ध्यान में लीन रहकर ध्यानी धूप और शीत सहन करते हैं। [3]
देखो, आज इन ब्रज की स्त्रियों का सौभाग्य कि वही सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने खड़े होकर माखन माँग रहे हैं! [4]
ब्रह्मा हूँ के ध्यान में न आवै कभू एक क्षण,
संकर समाधि लाय धरत ध्यान गाढ़ौ है। [1]
रिषि और मुनि जाको रैन दिन धरैं ध्यान,
ध्यान में न आवै कभू तासौ हेत बाढ़ौ है॥ [2]
सोई निरंजन जाकी माया कौ न आवै अंत,
ध्यानी ध्यान लाय रहें सहैं धूप जाढ़ौ है। [3]
देखौ ये भाग्य ब्रजवनितान के आली आज,
है कैंहूँ अनंत नवनीत माँगै ठाढ़ौ है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
जो ब्रह्मा के ध्यान में एक क्षण के लिए भी नहीं आते, जिनका शंकर जी पूर्ण एकाग्रता से समाधि लगाकर ध्यान कर रहे हैं। [1]
ऋषि और मुनि, जो दिन-रात उनका ध्यान करते हैं, फिर भी वे कभी उनके ध्यान में नहीं आते नहीं आते, जिनसे उनका विशेष प्रेम है। [2]
वही भगवान श्री कृष्ण जिनकी माया ने सारे विश्व को नचा रखा है, जिनके लिए ध्यान में लीन रहकर ध्यानी धूप और शीत सहन करते हैं। [3]
देखो, आज इन ब्रज की स्त्रियों का सौभाग्य कि वही सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने खड़े होकर माखन माँग रहे हैं! [4]

