श्रीललिता जू बीरी बनाय खवावैं हो।
हाथ सोहै कंचन की थारी, रमक झमक चली आवैं हो॥ [1]
हास विनोद परस्पर खेलत, नाना रंग बढ़ावैं हो।
केशव प्यारी जू अरु प्रीतम, रंग में रंग बढ़ावैं हो॥ [2]
- श्री केशव देव जी
श्रीललिता जी दिव्य दंपति (श्री राधा कृष्ण) को पान की बीड़ी बनाकर खवा रही हैं। करकमल में कंचन की थाली शोभित हो रही है। वे रमक झमक करती हुई चली आ रही हैं। [1]
दोनों प्रियाप्रियतम हास-विनोद करते हुए परस्पर खेल रहे हैं और नाना प्रकार के रंग बढ़ा रहे हैं। श्रीकेशवजी कहते हैं कि श्री लाड़ली लाल रस-रंग में भी और रस भर रहे हैं। [2]
हाथ सोहै कंचन की थारी, रमक झमक चली आवैं हो॥ [1]
हास विनोद परस्पर खेलत, नाना रंग बढ़ावैं हो।
केशव प्यारी जू अरु प्रीतम, रंग में रंग बढ़ावैं हो॥ [2]
- श्री केशव देव जी
श्रीललिता जी दिव्य दंपति (श्री राधा कृष्ण) को पान की बीड़ी बनाकर खवा रही हैं। करकमल में कंचन की थाली शोभित हो रही है। वे रमक झमक करती हुई चली आ रही हैं। [1]
दोनों प्रियाप्रियतम हास-विनोद करते हुए परस्पर खेल रहे हैं और नाना प्रकार के रंग बढ़ा रहे हैं। श्रीकेशवजी कहते हैं कि श्री लाड़ली लाल रस-रंग में भी और रस भर रहे हैं। [2]

