बिनु सिर प्रेमी रहै निरंतर सिर साँटे पिय पावै ।
नैननि नीर धीर तजि जीवै छिन-छिन गुण-गुण गावै ॥ [1]
जग तें सदा उदास आस इक रस रस आसव भावै ।
(जै श्री) रूपलाल हित ललित त्रिभंगी हित चित और न आवै ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
सच्चे प्रेमी सदा ही बिना सिर (अर्थात् अहंकार को त्याग) के रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रियतम को अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना सिर भी समर्पित कर दिया है। उनके नेत्र सदा प्रेम भरे आंसुओं से भींजे रहते हैं, पल पल उत्सुकता बढ़ती रहती है, एवं अपने प्रियतम के गुणों का गान कर, वे छिन-छिन अपने प्रियतम को लाड़ लड़ाते रहते हैं । [1]
वे संसार से निरंतर उदासीन रहते हैं, और उनकी एकमात्र इच्छा दिव्य प्रेम के रस का आस्वादन करने की होती है। श्री हित रूपलाल कहते हैं कि ऐसे प्रेमी भक्त का मन केवल श्रीकृष्ण के त्रिभंगी स्वरूप में ही अनन्य रूप से रमा रहता है, और उनके चित्त में अपने प्रियतम के अतिरक्त अन्य कुछ नहीं होता। [2]
नैननि नीर धीर तजि जीवै छिन-छिन गुण-गुण गावै ॥ [1]
जग तें सदा उदास आस इक रस रस आसव भावै ।
(जै श्री) रूपलाल हित ललित त्रिभंगी हित चित और न आवै ॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
सच्चे प्रेमी सदा ही बिना सिर (अर्थात् अहंकार को त्याग) के रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रियतम को अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपना सिर भी समर्पित कर दिया है। उनके नेत्र सदा प्रेम भरे आंसुओं से भींजे रहते हैं, पल पल उत्सुकता बढ़ती रहती है, एवं अपने प्रियतम के गुणों का गान कर, वे छिन-छिन अपने प्रियतम को लाड़ लड़ाते रहते हैं । [1]
वे संसार से निरंतर उदासीन रहते हैं, और उनकी एकमात्र इच्छा दिव्य प्रेम के रस का आस्वादन करने की होती है। श्री हित रूपलाल कहते हैं कि ऐसे प्रेमी भक्त का मन केवल श्रीकृष्ण के त्रिभंगी स्वरूप में ही अनन्य रूप से रमा रहता है, और उनके चित्त में अपने प्रियतम के अतिरक्त अन्य कुछ नहीं होता। [2]

