चिन्ता ही सूँ लगत है चरणदास उर आग - श्री चरण दास

चिन्ता ही सूँ लगत है चरणदास उर आग - श्री चरण दास

चिन्ता ही सूँ लगत है, चरणदास उर आग ।
तहाँ ध्यान हरि चरण कूँ, कैसे ही अब लाग ॥

- श्री चरणदास, चरण दास जी की बानी

यदि हृदय ही चिंता की अग्नि में जल रहा हो, तो, हे चरणदास, मन कैसे श्री हरि के कमल चरणों में लगा हुआ रह सकता है?