सहजै श्रीकृष्ण-कथा ठौर-ठौर - श्री नागरीदास जी की वाणी

सहजै श्रीकृष्ण-कथा ठौर-ठौर - श्री नागरीदास जी की वाणी

(कवित्त)
सहजै श्रीकृष्ण-कथा ठौर-ठौर होत तहाँ ,
कीर्तन-धुनि मीठी हिय के उलास तैं। [1]
श्यामा-श्याम रूप-गुण लीला-रंग रंगे लोग,
तिनके न ध्वांत उर प्रेम के प्रकाश तैं॥ [2]
एरे मन! मेरे चेत उन्हीं सों करि हेत,
‘नागर’ छुड़ाय देत जग दुःख-पास तैं। [3]
काम-क्रोध लोभ मोह मच्छरता राग द्वेष,
चाह दाह जैंहैं सब वृन्दावन-वास तैं॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी

जहां ठौर-ठौर पर श्रीकृष्ण की कथाएँ सहजता से हो रही हैं, कीर्तन की मधुर ध्वनि हृदय में उल्लास लाती है। [1]

श्यामा-श्याम के रूप, गुण, और लीलाओं के रंग में लोग रंगे हुए हैं, उस प्रेम के प्रकाश से हृदय कभी अंधकार में नहीं रहता। [2]

हे मन! चेत और उनसे प्रेम बढ़ा, क्योंकि वे संसार के समस्त दुःखों के बंधनों से मुक्त कर देते हैं। [3]

श्री नागरीदास कहते हैं कि समस्त विकार जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ममता, राग, द्वेष आदि वृंदावन वास के प्रभाव से स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। [4]