संध्या तरपन सब तजा तीरथ कवहुँ न जाऊँ - श्री मलूक दास

संध्या तरपन सब तजा तीरथ कवहुँ न जाऊँ - श्री मलूक दास

संध्या तरपन सब तजा, तीरथ कवहुँ न जाऊँ।
हरि हीरा हिरदै बसे, ताही भीतर न्हाऊँ॥

- श्री मलूकदास

संध्या, तर्पण आदि समस्त कर्मों का मैंने परित्याग कर दिया है, और तीर्थ आदि के लिए भी नहीं जाता हूँ क्योंकि मैंने जान लिया है कि साक्षात् श्री हरि मेरे हृदय में सदा वास करते हैं । अत: अब मैं केवल मन लगाकर उनकी प्रेमपूर्वक भक्ति में ही लीन रहता हूँ ।