ग्रह तज्यौ अरु नेह तज्यौ पुनि - श्री सुंदर जी

ग्रह तज्यौ अरु नेह तज्यौ पुनि - श्री सुंदर जी

(सवैया)
ग्रह तज्यौ अरु नेह तज्यौ पुनि,
खेह लगाइ के देह सवारी। [1]
मेघ सहै सिर शीत सह्यौ तनु,
धूप सहै जु पचागनि बारी॥ [2]
भूख सही रहै रूख तरै परि,
‘सुंदर’ दास सहै दुख भारी। [3]
डासन छाड़ि कै कासन ऊपरि,
आसन मारयौ पै आस न मारी॥ [4]

- श्री सुंदर जी

यद्यपि उसने अपने घर का त्याग कर, पारिवारिक जनों के स्नेह का नाता भी तोड़ लिया है और अपने शरीर को भी भस्म से भली-भाँति संवार लिया है। [1]

वह वर्षा, सर्दी, गर्मी जैसे द्वंद्वों को सहन करता हुआ, धूप में बैठकर पंचाग्नि तप भी कर रहा है। [2]

भूख-प्यास सहन करता हुआ, वृक्षों के नीचे बैठकर कठोर दुःख भी सहन कर रहा है। [3]

श्री सुन्दरदास जी कहते हैं कि उसने अपने कोमल बिछौना (बिस्तर) का त्याग कर घास की चटाई पर आसन तो बिछा लिया है। उसने शारीरिक त्याग तो कर दिया है, परंतु उसके मन ने अभी तक आशा और तृष्णा का त्याग नहीं किया है। [4]