करनी ही सो करि चुके, अब कछु करनी नाहिं ।
शरण गही हरिवंश की, परे विपिन रज माहिं॥
- श्री बुलाकीदास जी
जो कुछ करनी थी वो मैंने कर ली, अब मुझे और कुछ नहीं करना है । अब मैं श्री हित हरिवंश जी की शरण ग्रहण कर, श्री राधारानी की कृपा से श्री वृंदावन धाम की रज में पड़ा हूँ ।
शरण गही हरिवंश की, परे विपिन रज माहिं॥
- श्री बुलाकीदास जी
जो कुछ करनी थी वो मैंने कर ली, अब मुझे और कुछ नहीं करना है । अब मैं श्री हित हरिवंश जी की शरण ग्रहण कर, श्री राधारानी की कृपा से श्री वृंदावन धाम की रज में पड़ा हूँ ।

