वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी - नारद पंचरात्र (2.5.34)

वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी - नारद पंचरात्र (2.5.34)

वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी ।
सर्वत्र संन्ततं पातु सर्वेशा विरजेश्वरी ॥

- नारद पंचरात्र (2.5.34)

(भगवान शिव नारद जी से कहते हैं)
वनों में विहार करने वाली, श्री वृंदावन विनोदिनी श्री राधा मेरी वन में रक्षा करें। वे सर्वेश्वरी, विरजेश्वरी, पराशक्ति स्वामिनी, सर्वत्र, सदा मेरी रक्षा करें।