(सवैया)
रहे चकि लाल चितै मुख बाल,
परयौ मन रूप तरंगनि माहीं। [1]
भाइ सुभाइ उठ छिन ही छिन,
लालची नैन न क्यौं हूँ अघाहीं॥ [2]
जौवन रंग भरे अँग-अंग,
बिलास अनंत कहे नहिं जाहीं। [3]
बानिक आहि अनूप छबीली की,
पानिप की उपमा “ध्रुव” नाहीं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.52)
नवयुवती प्रिया (श्री राधा) का मुखकमल देख श्री लाल (श्रीकृष्ण) चकित रह जाते हैं, और उनका मन प्रियाजी के रूप की लहरों में झूमने लगता है। [1]
छिन-छिन उनके भीतर नए-नए प्रेमभाव उठने लगते हैं, और उनके रूप-लालची नेत्र किसी भी प्रकार की तृप्ति का अनुभव नहीं कर पाते। [2]
प्रिया के अंग-अंग में यौवन के नित्य नवीन रंगों का विकास होता रहता है एवं अनिर्वचनीय अनंत रस-विलास उमड़ता रहता है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि सच तो यह है कि प्रिया की रूप-सृष्टि और उनका लावण्य अद्वितीय है। [4]
रहे चकि लाल चितै मुख बाल,
परयौ मन रूप तरंगनि माहीं। [1]
भाइ सुभाइ उठ छिन ही छिन,
लालची नैन न क्यौं हूँ अघाहीं॥ [2]
जौवन रंग भरे अँग-अंग,
बिलास अनंत कहे नहिं जाहीं। [3]
बानिक आहि अनूप छबीली की,
पानिप की उपमा “ध्रुव” नाहीं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.52)
नवयुवती प्रिया (श्री राधा) का मुखकमल देख श्री लाल (श्रीकृष्ण) चकित रह जाते हैं, और उनका मन प्रियाजी के रूप की लहरों में झूमने लगता है। [1]
छिन-छिन उनके भीतर नए-नए प्रेमभाव उठने लगते हैं, और उनके रूप-लालची नेत्र किसी भी प्रकार की तृप्ति का अनुभव नहीं कर पाते। [2]
प्रिया के अंग-अंग में यौवन के नित्य नवीन रंगों का विकास होता रहता है एवं अनिर्वचनीय अनंत रस-विलास उमड़ता रहता है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि सच तो यह है कि प्रिया की रूप-सृष्टि और उनका लावण्य अद्वितीय है। [4]

