(कवित्त)
एक आस एकै बिसवास प्रान गहैं बास,
एक आस एकै बिसवास प्रान गहैं बास,
और पहचानि इन्हैं रही काहू सौं न है। [1]
चातिक लौं चाहै ‘घनआनँद’ तिहारी ओर,
आठौं जाम नाम लै, बिसारि दीनी मौन है॥ [2]
जीवन-अधार जान सुनियै पुकार नेकु,
अनाकानी दैबो दैया घाय कैसो लौन है। [3]
नेह-निधि-प्यारे गुन-भारे ह्वै न रूखे हूजै,
ऐसो तुम करौ तौ बिचारन कौं कौन है॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (260)
हे प्रियतम! तुमसे पुनः मिलने की एक मात्र आशा और विश्वास के सहारे ही मेरे ये प्राण (शरीर में) बचे हुए हैं, क्योंकि, इन्हें अब किसी दूसरे से पहचान नहीं रह गई है। [1]
आनंद प्रदान करने वाले मेघ-सहर्ष हे प्रियतम! चातक के समान मेरे प्राण तुम्हारी ओर ही देखते रहते हैं और मौन को त्यागकर अहर्निश तुम्हारे नाम की रट लगाए रहते हैं। [2]
जीवन के एकमात्र सहारे, है प्रिय सुजान! क्षणभर को मेरी पुकार तो सुन लीजिए—आपका निरंतर टाल-मटोल करना अथवा मेरी पुकार को सुना-अनसुना करना घाव पर नमक के समान मेरे लिये अत्यंत कष्टप्रद है। [3]
हे स्नेह के समुद्र! अत्यधिक गुणवान होकर, मेरे प्रति उदासीन मत बनो, यदि तुम ही ऐसा करोगे अर्थात् उपेक्षित करोगे, तो फिर मेरे इन बेचारे प्राणों का सहारा कौन है अर्थात तुम्हारे अतिरिक्त मेरा कोई सहारा नहीं है। [4]
आनंद प्रदान करने वाले मेघ-सहर्ष हे प्रियतम! चातक के समान मेरे प्राण तुम्हारी ओर ही देखते रहते हैं और मौन को त्यागकर अहर्निश तुम्हारे नाम की रट लगाए रहते हैं। [2]
जीवन के एकमात्र सहारे, है प्रिय सुजान! क्षणभर को मेरी पुकार तो सुन लीजिए—आपका निरंतर टाल-मटोल करना अथवा मेरी पुकार को सुना-अनसुना करना घाव पर नमक के समान मेरे लिये अत्यंत कष्टप्रद है। [3]
हे स्नेह के समुद्र! अत्यधिक गुणवान होकर, मेरे प्रति उदासीन मत बनो, यदि तुम ही ऐसा करोगे अर्थात् उपेक्षित करोगे, तो फिर मेरे इन बेचारे प्राणों का सहारा कौन है अर्थात तुम्हारे अतिरिक्त मेरा कोई सहारा नहीं है। [4]

