किशोरी मेरी सुनियो अरज सबेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (114)

किशोरी मेरी सुनियो अरज सबेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (114)

(राग मारवा व जैजैवन्ती)
किशोरी मेरी सुनियो अरज सबेरी।
कोटि जन्म में पाप न मिटि है, दौड़ूँ दोड़ घनेरी॥ [1]
अन्त कृपा सों काज सरेगो, ये निश्चै बुद्धि मेरी।
सब जंजाल छुटे छिन माहीं, तनक कृपा होय तेरी॥ [2 ]
विरह पीर अब हरो स्वामिनी, करिये नाहिंन देरी।
“रूपमाधुरी” सब सुख दैनीं, मंद हँसन कर हेरी॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (114)

हे किशोरी जी (श्री राधा), मेरी विनती को शीघ्र सुनिए। मैं चाहे जितना भी प्रयत्न कर लूँ, लेकिन करोड़ों जन्मों में भी मेरे पाप नहीं मिटेंगे। [1]

अन्त में मात्र आपकी कृपा से ही मेरा कल्याण होगा, यह मेरी बुद्धि ने निश्चय कर लिया है। समस्त जंजाल एक क्षण में छूट जायेंगे जब आपकी थोड़ी सी कृपा हो जाएगी। [2]

हे स्वामिनी, अब मेरी विरह की पीड़ा को मिटाओ, देरी न कीजिये। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं "हे सब सुखों को प्रदान करने वाली, मंद-मंद मुस्कुराते हुए मेरी ओर निहारिये।" [3]